राजकुमार
"जानी राज कुमार".
#03july
#08oct
#08oct
🎂जन्म की तारीख और समय: 08 अक्तूबर 1926, लोरलाई, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 03 जुलाई 1996, मुम्बई
पत्नी: गायत्री राजकुमार (विवा. ?–1996)
बच्चे: पुरु राजकुमार, वास्तविकता, पाणिनि राजकुमार
माता-पिता: जगदीश्वर नाथ पंडित, धनराज रानी पंडित
भाई: जीवनलाल पंडित, आनंद बाबी पंडित, महिन्द्रपाल पंडित
हिन्दी सिनेमा जगत में यूं तो अपने दमदार अभिनय से कई सितारों ने दर्शकों के दिल पर राज किया लेकिन एक ऐसा भी सितारा हुआ, जिसे सिर्फ दर्शकों ने ही नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री ने भी 'राजकुमार' माना और वह थे संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार।
🎂जन्म : 08 अक्तूबर 1926, लोरलाई, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु : 03 जुलाई 1996, मुम्बई
पत्नी: गायत्री राजकुमार (विवा. ?–1996)
बच्चे: वास्तविकता, पुरु राजकुमार, पाणिनि राजकुमार
माता-पिता: जगदीश्वर नाथ पंडित, धनराज रानी पंडित
भाई: जीवनलाल पंडित, आनंद बाबी पंडित, Mahindernath Pandit
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में 8 अक्टूबर 1926 को जन्मे राजकुमार स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई के माहिम थाने में सब इंस्पेक्टर के रूप में काम करने लगे।
एक दिन रात में गश्त के दौरान एक सिपाही ने राजकुमार से कहा कि हजूर आप रंग-ढंग और कद-काठी में किसी हीरो से कम नहीं है। फ़िल्मों में यदि आप हीरो बन जायें तो लाखों दिलों पर राज कर सकते हैं और राजकुमार को सिपाही की यह बात जंच गयी।
राजकुमार मुंबई के जिस थाने मे कार्यरत थे। वहां अक्सर फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार पुलिस स्टेशन में फ़िल्म निर्माता बलदेव दुबे कुछ जरूरी काम के लिये आये हुए थे। वह राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने राजकुमार से अपनी फ़िल्म 'शाही बाजार' में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की। राजकुमार सिपाही की बात सुनकर पहले ही अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। इसलिए उन्होंने तुरंत ही अपनी सब इंस्पेक्टर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और निर्माता की पेशकश स्वीकार कर ली।
शाही बाजार को बनने में काफी समय लग गया और राजकुमार को अपना जीवनयापन करना भी मुश्किल हो गया। इसलिए उन्होंने वर्ष 1952 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'रंगीली' में एक छोटी सी भूमिका स्वीकार कर ली। यह फ़िल्म सिनेमा घरों में कब लगी और कब चली गयी। यह पता ही नहीं चला। इस बीच उनकी फ़िल्म 'शाही बाजार' भी प्रदर्शित हुई। जो बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी।
शाही बाजार की असफलता के बाद राजकुमार के तमाम रिश्तेदार यह कहने लगे कि तुम्हारा चेहरा फ़िल्म के लिये उपयुक्त नहीं है। और कुछ लोग कहने लगे कि तुम खलनायक बन सकते हो। वर्ष 1952 से 1957 तक राजकुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।
'रंगीली' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली राजकुमार उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'अनमोल' 'सहारा', 'अवसर', 'घमंड', 'नीलमणि' और 'कृष्ण सुदामा' जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।
वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया में राज कुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राज कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फ़िल्म की सफलता के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।
वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राज कुमार ने यहाँ भी अपनी सशक्त भूमिका के ज़रिये दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। इसके बाद राज कुमार 'दिल अपना और प्रीत पराई-1960', 'घराना- 1961', 'गोदान- 1963', 'दिल एक मंदिर- 1964', 'दूज का चांद- 1964' जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी के ज़रिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1965 बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्म वक़्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। फ़िल्म वक़्त में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते या फिर चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं हाथ कट जाये तो ख़ून निकल आता है" दर्शकों के बीच
काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म वक़्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और ख्याति छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी ख़ास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी ख़ास इमेज में नहीं बंधे इसलिये अपनी इन फ़िल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने
⚰️मृत्यु की जगह और तारीख: 03 जुलाई 1996, मुम्बई
पत्नी: गायत्री राजकुमार (विवा. ?–1996)
बच्चे: पुरु राजकुमार, वास्तविकता, पाणिनि राजकुमार
माता-पिता: जगदीश्वर नाथ पंडित, धनराज रानी पंडित
भाई: जीवनलाल पंडित, आनंद बाबी पंडित, महिन्द्रपाल पंडित
हिन्दी सिनेमा जगत में यूं तो अपने दमदार अभिनय से कई सितारों ने दर्शकों के दिल पर राज किया लेकिन एक ऐसा भी सितारा हुआ, जिसे सिर्फ दर्शकों ने ही नहीं बल्कि पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री ने भी 'राजकुमार' माना और वह थे संवाद अदायगी के बेताज बादशाह कुलभूषण पंडित उर्फ राजकुमार।
🎂जन्म : 08 अक्तूबर 1926, लोरलाई, पाकिस्तान
⚰️मृत्यु : 03 जुलाई 1996, मुम्बई
पत्नी: गायत्री राजकुमार (विवा. ?–1996)
बच्चे: वास्तविकता, पुरु राजकुमार, पाणिनि राजकुमार
माता-पिता: जगदीश्वर नाथ पंडित, धनराज रानी पंडित
भाई: जीवनलाल पंडित, आनंद बाबी पंडित, Mahindernath Pandit
पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में 8 अक्टूबर 1926 को जन्मे राजकुमार स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद मुंबई के माहिम थाने में सब इंस्पेक्टर के रूप में काम करने लगे।
एक दिन रात में गश्त के दौरान एक सिपाही ने राजकुमार से कहा कि हजूर आप रंग-ढंग और कद-काठी में किसी हीरो से कम नहीं है। फ़िल्मों में यदि आप हीरो बन जायें तो लाखों दिलों पर राज कर सकते हैं और राजकुमार को सिपाही की यह बात जंच गयी।
राजकुमार मुंबई के जिस थाने मे कार्यरत थे। वहां अक्सर फ़िल्म उद्योग से जुड़े लोगों का आना-जाना लगा रहता था। एक बार पुलिस स्टेशन में फ़िल्म निर्माता बलदेव दुबे कुछ जरूरी काम के लिये आये हुए थे। वह राजकुमार के बातचीत करने के अंदाज से काफी प्रभावित हुए और उन्होंने राजकुमार से अपनी फ़िल्म 'शाही बाजार' में अभिनेता के रूप में काम करने की पेशकश की। राजकुमार सिपाही की बात सुनकर पहले ही अभिनेता बनने का मन बना चुके थे। इसलिए उन्होंने तुरंत ही अपनी सब इंस्पेक्टर की नौकरी से इस्तीफा दे दिया और निर्माता की पेशकश स्वीकार कर ली।
शाही बाजार को बनने में काफी समय लग गया और राजकुमार को अपना जीवनयापन करना भी मुश्किल हो गया। इसलिए उन्होंने वर्ष 1952 मे प्रदर्शित फ़िल्म 'रंगीली' में एक छोटी सी भूमिका स्वीकार कर ली। यह फ़िल्म सिनेमा घरों में कब लगी और कब चली गयी। यह पता ही नहीं चला। इस बीच उनकी फ़िल्म 'शाही बाजार' भी प्रदर्शित हुई। जो बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी।
शाही बाजार की असफलता के बाद राजकुमार के तमाम रिश्तेदार यह कहने लगे कि तुम्हारा चेहरा फ़िल्म के लिये उपयुक्त नहीं है। और कुछ लोग कहने लगे कि तुम खलनायक बन सकते हो। वर्ष 1952 से 1957 तक राजकुमार फ़िल्म इंडस्ट्री में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करते रहे।
'रंगीली' के बाद उन्हें जो भी भूमिका मिली राजकुमार उसे स्वीकार करते चले गए। इस बीच उन्होंने 'अनमोल' 'सहारा', 'अवसर', 'घमंड', 'नीलमणि' और 'कृष्ण सुदामा' जैसी कई फ़िल्मों में अभिनय किया लेकिन इनमें से कोई भी फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हुई।
वर्ष 1957 में प्रदर्शित महबूब ख़ान की फ़िल्म मदर इंडिया में राज कुमार गांव के एक किसान की छोटी सी भूमिका में दिखाई दिए। हालांकि यह फ़िल्म पूरी तरह अभिनेत्री नरगिस पर केन्द्रित थी फिर भी राज कुमार अपनी छोटी सी भूमिका में अपने अभिनय की छाप छोड़ने में कामयाब रहे। इस फ़िल्म में उनके दमदार अभिनय के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति भी मिली और फ़िल्म की सफलता के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता फ़िल्म इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।
वर्ष 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैग़ाम' में उनके सामने हिन्दी फ़िल्म जगत के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार थे लेकिन राज कुमार ने यहाँ भी अपनी सशक्त भूमिका के ज़रिये दर्शकों की वाहवाही लूटने में सफल रहे। इसके बाद राज कुमार 'दिल अपना और प्रीत पराई-1960', 'घराना- 1961', 'गोदान- 1963', 'दिल एक मंदिर- 1964', 'दूज का चांद- 1964' जैसी फ़िल्मों में मिली कामयाबी के ज़रिये राज कुमार दर्शको के बीच अपने अभिनय की धाक जमाते हुए ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ वह फ़िल्म में अपनी भूमिका स्वयं चुन सकते थे। वर्ष 1965 में प्रदर्शित फ़िल्म काजल की जबर्दस्त कामयाबी के बाद राज कुमार बतौर अभिनेता अपनी अलग पहचान बना ली। वर्ष 1965 बी.आर.चोपड़ा की फ़िल्म वक़्त में अपने लाजवाब अभिनय से वह एक बार फिर से अपनी ओर दर्शक का ध्यान आकर्षित करने में सफल रहे। फ़िल्म वक़्त में राज कुमार का बोला गया एक संवाद "चिनाय सेठ जिनके घर शीशे के बने होते है वो दूसरों पे पत्थर नहीं फेंका करते या फिर चिनाय सेठ ये छुरी बच्चों के खेलने की चीज़ नहीं हाथ कट जाये तो ख़ून निकल आता है" दर्शकों के बीच
काफ़ी लोकप्रिय हुआ। फ़िल्म वक़्त की कामयाबी से राज कुमार शोहरत की बुंलदियों पर जा पहुँचे। ऐसी स्थिति जब किसी अभिनेता के सामने आती है तो वह मनमानी करने लगता है और ख्याति छा जाने की उसकी प्रवृति बढ़ती जाती है और जल्द ही वह किसी ख़ास इमेज में भी बंध जाता है। लेकिन राज कुमार कभी भी किसी ख़ास इमेज में नहीं बंधे इसलिये अपनी इन फ़िल्मो की कामयाबी के बाद भी उन्होंने
'हमराज़- 1967',
'नीलकमल- 1968',
'मेरे हूजूर- 1968',
'हीर रांझा- 1970'
'पाकीज़ा- 1971'
में रूमानी भूमिका भी स्वीकार की जो उनके फ़िल्मी चरित्र से मेल नहीं खाती थी इसके बावजूद भी राज कुमार यहाँ दर्शकों का दिल जीतने में सफल रहे।
अभिनय और विविधता
संपादित करें
वर्ष 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फ़िल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राज कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राज कुमार ने
अभिनय और विविधता
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वर्ष 1978 में प्रदर्शित फ़िल्म कर्मयोगी में राज कुमार के अभिनय और विविधता के नए आयाम दर्शकों को देखने को मिले। इस फ़िल्म में उन्होंने दो अलग-अलग भूमिकाओं में अपने अभिनय की छाप छोड़ी। अभिनय में एकरुपता से बचने और स्वयं को चरित्र अभिनेता के रूप में भी स्थापित करने के लिए राज कुमार ने अपने को विभिन्न भूमिकाओं में पेश किया। इस क्रम में वर्ष 1980 में प्रदर्शित फ़िल्म बुलंदी में वह चरित्र भूमिका निभाने से भी नहीं हिचके और इस फ़िल्म के जरिए भी उन्होंने दर्शको का मन मोहे रखा। इसके बाद राज कुमार ने
'कुदरत- 1981',
'धर्मकांटा- 1982',
'शरारा- 1984',
'राजतिलक- 1984',
'एक नयी पहेली- 1984',
'मरते दम तक- 1987',
'सूर्या- 1989',
'जंगबाज- 1989',
'पुलिस पब्लिक- 1990'
जैसी कई सुपरहिट फ़िल्मों के ज़रिये दर्शको के दिल पर राज किया।
वर्ष 1991 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सौदागर' में राजकुमार के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित इस फ़िल्म में राजकुमार 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैगाम' के बाद दूसरी बार दिलीप कुमार के सामने थे और अभिनय की दुनिया के इन दोनों महारथियों का टकराव देखने लायक था।
पुरस्कार
राज कुमार ने 'दिल एक मंदिर' और 'वक़्त' के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार प्राप्त किया। फिल्म उद्योग का नोबेल,फिल्म जगत का सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहेब फाल्के पुरस्कार 1996 से भी नवाजा गया।
⚰️मृत्यु
अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राज कुमार 3 जुलाई 1996 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए।
📽️
1995 बकवास
1995 ग़ॉड एंड गन
1995 जवाब
1994 बेताज बादशाह
1993 इंसानियत के देवता
1993 तिरंगा
1992 पुलिस और मुज़रिम
1991 सौदागर
1990 पुलिस पब्लिक
1989 सूर्या
1989 जंगबाज़
1989 देश के दुश्मन
1989 गलियों का बादशाह
1988 मोहब्बत के दुश्मन
1988 साजिश
1988 महावीरा
1987 इतिहास
1987 मरते दम तक
1987 मुकद्दर का फैसला
1984 एक नई पहेली
1984 सहारा
1984 राज तिलक
1982 धर्म काँटा
1981 कुदरत
1980 चम्बल की कसम
1980 बुलन्दी
1978 कर्मयोगी
1976 एक से बढ़कर एक
1974 36 घंटे
1973 हिन्दुस्तान की कसम
1972 दिल का राजा
1971 लाल पत्थर
1971 मर्यादा
1971 पाकीज़ा
1970 हीर राँझा
1968 मेरे हुज़ूर
1968 वासना
1968 नीलकमल
1967 नई रोशनी
1967 हमराज़
1965 वक्त
1965 रिश्ते नाते
1965 ऊँचे लोग
1965 काजल
1964 ज़िंदगी
1963 प्यार का बंधन
1963 फूल बने अंगारे
1963 गोदान
1963 दिल एक मन्दिर
1961 घराना
1960 दिल अपना और प्रीत पराई
1959 अर्द्धांगिनी
1959 उजाला
1959 शरारत
1959 पैग़ाम
1958 पंचायत
1957 मदर इण्डिय
1957 कृष्ण-सुदामा
1957 नौशेरवान-ए-आदिल नौशाजाद/जोसेफ
1957 नीलमणि
1955 घमंड
1953 अवसर
1952 अनमोल सहारा
1952 रंगीली
वर्ष 1991 में प्रदर्शित फ़िल्म 'सौदागर' में राजकुमार के अभिनय के नए आयाम देखने को मिले। सुभाष घई की निर्मित इस फ़िल्म में राजकुमार 1959 में प्रदर्शित फ़िल्म 'पैगाम' के बाद दूसरी बार दिलीप कुमार के सामने थे और अभिनय की दुनिया के इन दोनों महारथियों का टकराव देखने लायक था।
पुरस्कार
राज कुमार ने 'दिल एक मंदिर' और 'वक़्त' के लिए फ़िल्मफ़ेयर सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पुरस्कार प्राप्त किया। फिल्म उद्योग का नोबेल,फिल्म जगत का सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहेब फाल्के पुरस्कार 1996 से भी नवाजा गया।
⚰️मृत्यु
अपने संजीदा अभिनय से लगभग चार दशक तक दर्शकों के दिल पर राज करने वाले महान अभिनेता राज कुमार 3 जुलाई 1996 के दिन इस दुनिया को अलविदा कह गए।
📽️
1995 बकवास
1995 ग़ॉड एंड गन
1995 जवाब
1994 बेताज बादशाह
1993 इंसानियत के देवता
1993 तिरंगा
1992 पुलिस और मुज़रिम
1991 सौदागर
1990 पुलिस पब्लिक
1989 सूर्या
1989 जंगबाज़
1989 देश के दुश्मन
1989 गलियों का बादशाह
1988 मोहब्बत के दुश्मन
1988 साजिश
1988 महावीरा
1987 इतिहास
1987 मरते दम तक
1987 मुकद्दर का फैसला
1984 एक नई पहेली
1984 सहारा
1984 राज तिलक
1982 धर्म काँटा
1981 कुदरत
1980 चम्बल की कसम
1980 बुलन्दी
1978 कर्मयोगी
1976 एक से बढ़कर एक
1974 36 घंटे
1973 हिन्दुस्तान की कसम
1972 दिल का राजा
1971 लाल पत्थर
1971 मर्यादा
1971 पाकीज़ा
1970 हीर राँझा
1968 मेरे हुज़ूर
1968 वासना
1968 नीलकमल
1967 नई रोशनी
1967 हमराज़
1965 वक्त
1965 रिश्ते नाते
1965 ऊँचे लोग
1965 काजल
1964 ज़िंदगी
1963 प्यार का बंधन
1963 फूल बने अंगारे
1963 गोदान
1963 दिल एक मन्दिर
1961 घराना
1960 दिल अपना और प्रीत पराई
1959 अर्द्धांगिनी
1959 उजाला
1959 शरारत
1959 पैग़ाम
1958 पंचायत
1957 मदर इण्डिय
1957 कृष्ण-सुदामा
1957 नौशेरवान-ए-आदिल नौशाजाद/जोसेफ
1957 नीलमणि
1955 घमंड
1953 अवसर
1952 अनमोल सहारा
1952 रंगीली
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