जी एस कोहली (संगीतकार)
#25जुलाई
गुरुशरण सिंह कोहली
🎂1928
⚰️25 जुलाई, 1996
बॉलीवुड के महान संगीतकार जिसे दुनिया ने भुला दिया इस सुरीले संगीतकार की मृत्यु मुंबई में 25 जुलाई 1996 में हुई,
आज उनकी डेथ एनिवर्सरी है,
इंडस्ट्री में उनके काम के बारे में बात करे तो शिकारी फिल्म उन्नीस सौ तिरसठ में प्रदर्शित हुई. फिल्म के गाने ने धूम मचा दी थी. हालांकि फिल्म बी ग्रेड थी, लेकिन गाने के चलते यह फिल्म बहुत सफल हुई थी. सामान्य कहानी कोई बड़ी स्टार कास्ट भी नहीं लेकिन फिल्म हिट रही. बॉक्स ऑफिस पर आय की दृष्टि से उन दिनों यह फिल्म सातवें पायदान पर थी.
इसका मुख्य कारण रहा फिल्म का संगीत फिल्म के सभी गीत एक से बढ़कर एक थे. तुमको पिया दिल दिया कितने नाज से चमन के फ़ूल भी तुझको गुलाब कहते हैं. मांगी है दुआएं हमने सनम. बाजे घुंगरू छुन छुन यह रंगीन महफिल गुलाबी गुलाबी और अगर मैं पूछूं जवाब दोगे जैसे गीत उस समय तो संगीत रसिकों के सिर पर चढ़कर बोले लेकिन आज भी यह सारे गीत कानों में शहद घोलता है. इस फिल्म के संगीतकार थे जी एस कोहली 1928 में पंजाब में जन्मे गुरुशरण सिंह कोहली ढोलक एवं अन्य वाद्य के अच्छे जानकार रहे संगीतकार ओ० पी० नय्यर ने अपनी पहली फिल्म दिलसुख पंचोली के आसमान जो उन्नीस सौ बावन में रिलीज़ की थी.
उसमें जब संगीत दिए, तब वह अपना मुख्य सहायक के रूप में जी एस कोहली को चुने थे. गुरुशरण सिंह कोहली को उन्नीस सौ बावन से 1968 तक ओ० पी० नय्यर का सहायक के रूप में काम करने का मौका मिला ओ० पी० नय्यर की फिल्म सीआईडी और मिस्टर एंड मिसेज 555 अरे पार नया दौर कश्मीर की कली किस्मत यह रात फिरना आएगी आदि कई फिल्म में गुरु सुरन सिंह कोहली ने नया साहब के सहायता की म्यूजिक कंपोज करने में धुन बनाने में मदद किया और सभी हिट भी हुए , 1960 में स्वतंत्र रूप से जीएस कोहली पहले फिल्म लंबे हाथ में संगीत दिया 'प्यार की राह दिखा दुनिया को रोके जो नफरत की आंधी' रफी साहब की आवाज़ में यह गाना बेहद लोकप्रिय हुआ था,इस फिल्म के गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस पर सुना जाता है, बेहतरीन गाने के बाद भी बॉलीवुड इस महान सिंगर और उसके टैलेंट को भूल गया
जी एस कोहली
(गुरुशरण सिंह कोहली)
🎂1928
⚰️25 जुलाई, 1996
हिंदी सिनेमा के बेहद प्रतिभाशाली संगीतकारों में से एक जीएस कोहली की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि।
जीएस कोहली (गुरुशरण सिंह कोहली) का जन्म 1928 में पंजाब में हुआ था। वह ढोलक और कई वाद्ययंत्र बजाने में माहिर थे। जब दलसुख एम. पंचोल ने ओपी नैयर को फ़िल्म आसमान (1952) में अपना पहला ब्रेक दिया, तो ओपी नैय्यर ने कोहली को अपने सहायक के रूप में चुना स्वतंत्र संगीतकार बनने के बाद भी कोहली 1968 तक उनके सहायक रहे।'
1960 तक, कोहली ने ओपी नैयर की लोकप्रिय फिल्मों जैसे सीआईडी, मिस्टर एंड मिसेज 55, आर पार, हम सब चोर हैं, नया दौर, मुजरिम, दो उस्ताद, कश्मीर की कली आदि में महत्वपूर्ण योगदान दिया था
1960 में एक स्वतंत्र संगीत निर्देशक के रूप में कोहली की पहली फिल्म आई - 'लंबे हाथ' थी उनकी दूसरी फिल्म मिस्टर इंडिया (1961) थी और उसके बाद फौलाद, शिकारी, चार दरवेश, एडवेंचर्स ऑफ रॉबिन हुड, नमस्तेजी, दो मतवाले, नौजवान, संगदिल, जंग और अमन और गुंडा आई उनकी आखिरी फिल्म 1969 में जालसाज़ थी।
हालांकि कोहली ओपी नैयर के लिए एक अरेंजर्स और संगीतकार के रूप में असाधारण थे, मगर स्वतंत्र संगीतकार के रूप में प्रसिद्ध नहीं हो पाए और संगीत के लिए उनके पास केवल बी और सी ग्रेड की फिल्में थीं केवल शिकारी और नमस्तेजी के गाने ही लोकप्रिय हुए थे। प्रसिद्ध गीत "चमन के फूल भी तुझको" और "अगर मैं पूछूं जवाब दोगे" शिकारी (1963) के हिट गाने थे। और फ़िल्म 'द एडवेंचर्स ऑफ रॉबिनहुड' (1965) से मोहम्मद रफी की भावपूर्ण धुन "माना मेरे हसीन सनम" को कोई कैसे भूल सकता है?
वह एक संगीत निर्देशक के रूप में इतने प्रसिद्ध नहीं थे, लेकिन यदि कोई उनके गीतों को सुनता है, तो वह निश्चित रूप से आश्चर्यचकित होगा कि वह इतने प्रसिद्ध क्यों नहीं थे और प्रचुर प्रतिभा होने के बावजूद सफलता उसे क्यों नहीं मिली।
अगर किसी ने ढोलक बजाने में विशेषता प्राप्त की तो उनमें एक नाम जी.एस. कोहली का भी था। वैसे वे कई वाद्य आसानी से बजा लेते थे। इनका जन्म 1928 में पंजाब में हुआ। जब पहली फिल्म दलसुख पंचोली ने संगीतकार के तौर पर ओ.पी. नय्यर (ओंकार प्रसाद नव्यर), को 'आसमान' (1952) दी तो जी.एस. कोहली उनके असिस्टेंट बने। वैसे वो बहुत अच्छे अरेंजर भी थे। अपने आप में स्वतन्त्र संगीत देने के बाद भी वे ओ.पी. नव्यर के असिस्टेंट ही रहे जैसे दत्ताराम वाडकर शंकर-जयकिशन के रहे।
साठ के दशक तक ओ.पी. नय्यर की फिल्मों के संगीत की मिठास में जी.एस. कोहली का बहुत सहयोग रहा जैसे 'सी.आई.डी.', 'मिस्टर एंड मिसेस 55', 'आर-पार', 'हम सब चोर हैं', 'नया दौर', 'मुजरिम, 'दो उस्ताद', 'कश्मीर की कली' आदि।
1960 के दौर में स्वतन्त्र संगीकार के रूप में उनको पहली फिल्म मिली 'लम्बे हाथ'। इस फिल्म का गाना 'प्यार की राह दिखा दुनिया को रोके जो नफरत की आँधी' जिसे गाया था मो रफीने और लिखा था अनजान 1 ने, एक वादगार गीत है। दूसरी फिल्म थी 'मि. इण्डिया' (1961)
उसके बाद तो
'फौलाद' (1963), 'शिकारी' (1963),
'चार दरवेश',और
'नमस्ते जी',
'दो मतवाले', 'नौजवान संगदिल' 'जंग और अमन', 'गुण्डा', 'जालसाज़' आदि फिल्मों में संगीत दिया। आखिरी फिल्म थी 'महादान' (1984)।
इन सब फिल्मों का संगीत इतना लोकप्रिय नहीं हुआ। मगर 'शिकारी' (1963) के गानों ने धूम मचा दी। 'चमन के फूल भी तुझको गुलाब कहते हैं' और 'तुमको पिया दिल दिया बड़े नाज़ से' इन गीतों में पंजाबी धुनों की पूरी छाप है। 'शिकारी' के गाने लिखे थे फारुक केसर तथा कमर जलालाबादी ने, फिल्म को निर्देशित किया था मोहम्मद हुसैन हीरो थे अजीत और रागिनी तथा निर्माता थे फकीरचन्द मेहरा।
अच्छी धुनों को जन्म देने वाला ये संगीतकार इतना मशहूर क्यों नहीं हुआ ये भी एक आश्चर्य है, जबकि जी.एस. कोहली में प्रतिभा की कोई कमी नहीं की।
कहा जाता है ओ.पी. नय्यर की तरह ये भी शॉर्ट टेम्पार्ड थे। कभी-कभी तो वे ओ.पी. नेव्यर से भी उलझ जाते थे। इन्होंने लगभग 15 फिल्मों में संगीत दिया जो या तो स्टंट फिल्में थीं या बी ग्रेड की फिल्में थीं। उनका दुर्भाग्य कि उनको बड़े वैनर की फिल्में नहीं मिलीं।
'शिकारी' (1963) एफ.सी. मेहरा को छोड़कर नतीजा ये हुआ कि वे डिप्रेशन में चले गये और उनकी प्रतिभा व्यर्थ चली गयी।
'शिकारी' में लता मंगेशकार, उपा मंगेशकर और आशा भोंसले ने गीत गाये।
अनजान जी.एस. कोहली के मनपसन्द गीतकार थे जिन्होंने 'डॉन' का गाना 'खाय के पान बनारसवाला' लिखा था। 'लम्बे हाथ' में इनको गाना लिखने का पहला मौका मिला।
25 जुलाई, 1996 को संगीत प्रतिभा के धनी इस संगीतकार का निधन हो गया।
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