नसीरूदीन शाह
#20july
नसीरुद्दीन शाह
20 जुलाई 1950
मुख्य धारा एवं समानांतर फ़िल्म के महान अभिनेता निर्देशक नसीरुद्दीन शाह
20 जुलाई 1950
बाराबंकी
पत्नी: रत्ना पाठक (विवा. 1982)
भाई: ज़मीरुद-दीन शाह
बच्चे: हीबा शाह, इमाद शाह, विवान शाह
आने वाली फ़िल्म: टाइम मशीन
माता-पिता: फ़ारूख सुल्तान, अले मोहम्मद शाह
नसीरुद्दीन शाह एक प्रसिद्ध अभिनेता हैं। नसीरुद्दीन शाह भारतीय फ़िल्म उद्योग के सबसे प्रतिभाशाली कलाकारों में से एक हैं। मुख्यधारा की व्यावसायिक सिनेमा से लेकर कला फ़िल्मों और नाटकों तक उन्होंने अपने अभिनय की बहुमुखी प्रतिभा का परिचय दिया है। नसीरुद्दीन शाह इस नाम का ज़िक्र होते ही एक ऐसे साधारण पर आकर्षक व्यक्तित्व की छवि सामने आती है जिसकी अभिनय-प्रतिभा अतुलनीय है, जिसके चेहरे का तेज असाधारण है और हिन्दी सिनेमा में जिसके योगदान को किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
नसीरुद्दीन शाह का जन्म 20 जुलाई 1950 को उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में हुआ था। नसीरुद्दीन शाह की पत्नी का नाम रत्ना शाह है। इनके बेटे का नाम इमाद शाह है।
नसीरुद्दीन शाह ने अजमेर तथा नैनीताल के सेंट जोसेफ कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और उसके बाद मुस्लिम यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की। फिर नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा, दिल्ली से भी प्रशिक्षण प्राप्त किया।
मुख्यधारा तथा समानांतर हिन्दी सिनेमा दोनों में ही वे सफल रहे। बहुत सी अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्मों में भी काम किया। निशांत, आक्रोश, स्पर्श, मिर्च मसाला, अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है, त्रिकाल, जुनून, मंडी, मोहन जोशी हाज़िर हो, अर्द्ध सत्य, कथा आदि उनकी लोकप्रिय समानांतर फ़िल्में रहीं तथा वहीं दूसरी ओर मासूम, कर्मा, इजाज़त, जलवा, हीरो हीरालाल, ग़ुलामी, त्रिदेव, विश्वात्मा, मोहरा, सरफ़रोश, बाजा़र, उमराव जान, हे राम, इक़बाल, अ वेनस्डे, मॉनसून वेडिंग, इश्किया, परजानिया, खुदा के लिए, राजनीति, दस कहानियाँ, कृष, ओंकारा, फ़िराक़ आदि मुख्य धारा की फ़िल्मों के साथ-साथ मिर्ज़ा ग़ालिब तथा भारत एक खोज धारावाहिकों के भी वे हिस्सा बने। उन्होंने लवेन्द्र कुमार, इस्मत चुगताई, मंटो लिखित नाटकों का निर्देशन भी किया। 2006 में फ़िल्म निर्देशन में भी हाथ आज़माया और यूं होता तो क्या होता का निर्देशन किया जिसकी स्टारकास्ट में शामिल थे उनके साहबज़ादे इमाद शाह, आयशा टाकिया, कोंकना सेन शर्मा, परेश रावल तथा इरफ़ान खान।
नसीरुद्दीन शाह को 1987 में पद्म श्री और 2003 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया है।
1979 में फ़िल्म स्पर्श और 1984 में फ़िल्म पार के लिए उन्हें सर्वोत्कृष्ट अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
1981 में आक्रोश, 1982 में चक्र, 1984 में मासूम, 1985 में पार तथा अ वेनस्डे के लिए उन्हें फ़िल्म फेयर के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के अवार्ड से सम्मानित किया गया।
फ़िल्म इक़बाल के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेता के राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
नसीरूद्दीन शाह ने अपने कॅरियर की शुरुआत फ़िल्म निशांत से की थी जिसमें उनके साथ स्मिता पाटिल और शबाना आजमी जैसी अभिनेत्रियां थीं। ‘निशांत’ एक आर्ट फ़िल्म थी। यह फ़िल्म कमाई के हिसाब से तो पीछे रही पर फ़िल्म में नसीरुद्दीन शाह के अभिनय की सबने सराहना की। इस के बाद नसीरुद्दीन शाह ने आक्रोश, ‘स्पर्श’, ‘मिर्च मसाला’, ‘अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है’, ‘मंडी’, ‘मोहन जोशी हाज़िर हो’, ‘अर्द्ध सत्य’, ‘कथा’ आदि कई आर्ट फ़िल्में कीं।
आर्ट फ़िल्मों के साथ वह व्यापारिक फ़िल्मों में भी सक्रिय रहे। ‘मासूम’, ‘कर्मा’, ‘इजाज़त’, ‘जलवा’, ‘हीरो हीरालाल’, ‘गुलामी’, ‘त्रिदेव’, ‘विश्वात्मा’, ‘मोहरा’, सरफ़रोश जैसी व्यापारिक फ़िल्में कर उन्होंने साबित कर दिया कि वह सिर्फ आर्ट ही नहीं कॉमर्शियल फ़िल्में भी कर सकते हैं। नसीरूद्दीन शाह के फ़िल्मी सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्होंने मसाला हिन्दी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में कोई हिचक नहीं दिखायी। वक्त के साथ नसीरूद्दीन शाह ने फ़िल्मों के चयन में पुन: सतर्कता बरतनी शुरू कर दी। बाद में वे कम मगर, अच्छी फ़िल्मों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने लगे।
नसीरूद्दीन शाह ने एक फ़िल्म का निर्देशन भी किया है। हाल ही में वह “इश्किया”, “राजनीति” और “जिंदगी ना मिलेगी दुबारा” जैसी फ़िल्मों में अपने अभिनय का जादू बिखेर चुके हैं।
विवाद
असल में नसीरुद्दीन शाह को अपने हाल के एक इंटरव्यू की वजह से काफ़ी निशाना बनाया गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में अब सिंधी भाषा नहीं बोली जाती. इसके तुरंत बाद उन्होंने फ़ेसबुक पर माफ़ीनामा जारी किया और इसे अपनी तरफ़ से 'ग़लती' और 'ग़लत बयान'
नुपुर शर्मा द्वारा पैगंबर मोहम्मद पर की गई टिप्पणी पर अभिनेता नसीरुद्दीन शाह की प्रतिक्रिया सामने आई है। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि इस मामले में देर से कार्रवाई की गई।नसीरुद्दीन शाह ने कहा, 'प्रधानमंत्री मोदी अगर समाज में फैल रही नफरत को रोकना चाहते हैं तो उन्हें आगे आना चाहिए।
उन्होंने 17 से 19 दिसंबर तक हरिद्वार में आयोजित धर्म संसद पर सवाल उठाते हुए कहा था कि हम 20 करोड़ लोग इतनी आसानी से हार नहीं मानेंगे।
उन्होंने कहा था कि मुगलों ने देश को संगीत, नृत्य जैसी कला दी है। कई ऐतिहासिक स्मारक, इमारत आज भी मुगल काल के गौरव को बयां करती हैं। मुगलों का योगदान अहम है। अब उनका यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।
नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि 'लव जिहाद' के नाम पर चलाया जा रहा अभियान एक तमाशा है। ताकि हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सामाजिक संपर्क को रोका जा सके। जिन लोगों ने यह मुहावरा गढ़ा है, वे जिहाद का मतलब ही नहीं जानते। मुझे नहीं लगता कि कोई भी इस बात को मानेगा कि एक दिन इस देश में मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से आगे निकल जाएगी।'
अभिनेता नसीरुद्दीन शाह ने कहा था कि मुझे आज के भारत से डर लगता है। अपने बच्चों के लिए चिंता होती है। आज के माहौल को देखते हुए, मैं एक ऐसी स्थिति की कल्पना करता हूं, जहां मेरे बच्चों को क्रोधित भीड़ ने घेर लिया है और उनसे पूछ रहे हैं कि "क्या आप हिंदू हो या मुस्लिम?
उन्हों ने कहा मैं मुसलमान हूं और मेरी वाइफ हिंदू। धर्म के नाम पर भारतीय समाज में "जहर" फैलाया जा रहा है।
सीएए-एनआरसी पर नाराज हुए अभिनेता
मेरे पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। मैं इस उम्र में जन्म प्रमाण पत्र कहां से लाऊं। क्या इसका मतलब यह है कि हम सब बहिष्कृत होने वाले हैं? अगर यहां 70 साल तक रहना मुझे भारतीय साबित नहीं करता है, फिर मुझे नहीं पता कि क्या मुझे भारतीय साबित करेगा। मुझे डर नहीं है, मैं चिंतित नहीं हूं, मैं इस बात से नाराज हूं कि ऐसा कानून हम पर थोपा जा रहा है।"
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